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Bihar Police: फर्जी पहचान से बिहार पुलिस में नौकरी लेने वाले कॉन्स्टेबल को सुप्रीम कोर्ट से झटका

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सुप्रीम Court ने फर्जी पहचान और जाली दस्तावेजों के जरिए बिहार पुलिस में नौकरी लेने वाले झारखंड पुलिस के बर्खास्त कॉन्स्टेबल को राहत देने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि पुलिस सेवा में धोखाधड़ी की कोई जगह नहीं

NEW DELHI/आलम की खबर: सरकारी नौकरी में फर्जीवाड़ा और जाली दस्तावेजों के इस्तेमाल से जुड़े एक गंभीर मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने फर्जी पहचान के आधार पर बिहार पुलिस में नौकरी हासिल करने वाले झारखंड पुलिस के बर्खास्त कॉन्स्टेबल को कोई राहत देने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा कि पुलिस जैसी अनुशासित और संवेदनशील सेवा में धोखाधड़ी, जालसाजी और फर्जी पहचान के जरिए प्रवेश करने वालों के लिए कोई स्थान नहीं हो सकता।

सुप्रीम कोर्ट की दो सदस्यीय खंडपीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए झारखंड हाईकोर्ट के उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें आरोपी कॉन्स्टेबल को राहत दी गई थी। अदालत ने माना कि विभागीय जांच और बर्खास्तगी की कार्रवाई पूरी तरह वैध थी तथा आरोपी का आचरण पुलिस सेवा की गरिमा और अनुशासन के खिलाफ था।

मामला झारखंड पुलिस के पूर्व कॉन्स्टेबल रंजन कुमार से जुड़ा है। जानकारी के अनुसार उसकी नियुक्ति वर्ष 2005 में झारखंड पुलिस में कॉन्स्टेबल के रूप में हुई थी। वह धुरकी थाना क्षेत्र में रिजर्व गार्ड के तौर पर तैनात था। कुछ वर्षों तक सेवा देने के बाद उसे दिसंबर 2007 में छुट्टी मिली थी, लेकिन छुट्टी समाप्त होने के बाद वह वापस ड्यूटी पर नहीं लौटा। लंबे समय तक अनुपस्थित रहने के कारण विभाग को उस पर संदेह हुआ और जांच शुरू की गई।

जांच के दौरान जो तथ्य सामने आए, उन्होंने पुलिस विभाग को भी हैरान कर दिया। पता चला कि झारखंड पुलिस से गायब रहने के दौरान उसने बिहार पुलिस में दूसरी नौकरी हासिल कर ली थी। इसके लिए उसने अपनी असली पहचान छिपाई और नया नाम अपनाया। आरोप है कि उसने खुद को “संतोष कुमार” बताकर बिहार पुलिस में भर्ती हासिल की और इसके लिए जाली दस्तावेजों का इस्तेमाल किया।

सूत्रों के अनुसार आरोपी ने फर्जी प्रमाणपत्र और पहचान संबंधी दस्तावेजों के जरिए भर्ती प्रक्रिया को प्रभावित किया। जांच में सामने आया कि बिहार पुलिस में भर्ती होने के बाद भी उसका व्यवहार अनुशासनहीन रहा और कुछ समय बाद वह वहां की ड्यूटी भी बिना अनुमति छोड़कर गायब हो गया। इसके बाद मामला और गंभीर हो गया तथा दोनों राज्यों की पुलिस ने संयुक्त रूप से जांच शुरू की।

पटना के तत्कालीन वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक और जहानाबाद पुलिस की रिपोर्ट में यह स्पष्ट हुआ कि रंजन कुमार और संतोष कुमार नाम से नौकरी करने वाला व्यक्ति एक ही है। इस खुलासे के बाद विभागीय जांच तेज कर दी गई। जांच में आरोपी के खिलाफ कई गंभीर आरोप तय किए गए, जिनमें फर्जी पहचान का इस्तेमाल, प्रतिरूपण, सरकारी सेवा में धोखाधड़ी, जालसाजी, बिना अनुमति अनुपस्थित रहना और सेवा नियमों का उल्लंघन शामिल था।

विभागीय जांच अधिकारी ने सभी आरोपों को प्रमाणित माना। इसके बाद झारखंड पुलिस विभाग ने आरोपी को सेवा से बर्खास्त कर दिया। हालांकि आरोपी ने इस फैसले को अदालत में चुनौती दी और मामला झारखंड हाईकोर्ट पहुंचा। हाईकोर्ट ने विभागीय कार्रवाई को रद्द करते हुए आरोपी को राहत दे दी थी। लेकिन राज्य सरकार ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।

सुप्रीम कोर्ट ने पूरे मामले की सुनवाई के दौरान बेहद सख्त रुख अपनाया। अदालत ने कहा कि पुलिस बल जैसी सेवा केवल नौकरी नहीं बल्कि कानून व्यवस्था और सार्वजनिक सुरक्षा से जुड़ी जिम्मेदारी है। ऐसे विभाग में कार्यरत कर्मचारी से ईमानदारी, पारदर्शिता और अनुशासन की सर्वोच्च अपेक्षा की जाती है। यदि कोई व्यक्ति फर्जी दस्तावेज और झूठी पहचान के जरिए ऐसी सेवा में प्रवेश करता है, तो यह पूरे तंत्र के साथ धोखा माना जाएगा।

शीर्ष अदालत ने यह भी कहा कि आरोपी ने जानबूझकर अपनी वास्तविक पहचान छिपाई और सरकारी व्यवस्था को भ्रमित कर दूसरी नौकरी हासिल की। अदालत के अनुसार यह केवल सेवा नियमों का उल्लंघन नहीं बल्कि सार्वजनिक विश्वास के साथ भी खिलवाड़ है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में नरमी बरतना गलत संदेश देगा और सरकारी संस्थानों की विश्वसनीयता प्रभावित होगी।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी माना कि विभागीय जांच पूरी तरह नियमों के तहत की गई थी और आरोपी को अपना पक्ष रखने का अवसर दिया गया था। अदालत को जांच प्रक्रिया में किसी प्रकार की कानूनी कमी नहीं मिली। इसलिए बर्खास्तगी का आदेश उचित और वैध माना गया।

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला सरकारी नौकरियों में फर्जीवाड़ा करने वालों के लिए बड़ा संदेश है। हाल के वर्षों में कई राज्यों में फर्जी प्रमाणपत्र, गलत पहचान और दोहरी नौकरी से जुड़े मामले सामने आए हैं। ऐसे मामलों में सुप्रीम कोर्ट का यह रुख भविष्य के लिए एक सख्त उदाहरण माना जा रहा है।

प्रशासनिक विशेषज्ञों का कहना है कि पुलिस सेवा में अनुशासन और सत्यनिष्ठा सबसे महत्वपूर्ण गुण माने जाते हैं। यदि भर्ती प्रक्रिया में ही धोखाधड़ी हो जाए तो इसका असर पूरे सिस्टम पर पड़ता है। यही वजह है कि अदालत ने इस मामले को गंभीर मानते हुए सख्त टिप्पणी की।

फिलहाल सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि फर्जी पहचान और जाली दस्तावेजों के आधार पर सरकारी नौकरी हासिल करने वालों को अदालत से राहत मिलना आसान नहीं होगा। यह फैसला सरकारी सेवाओं में पारदर्शिता और ईमानदारी बनाए रखने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

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